📚 राजयोग कोर्स का छठवाँ दिन

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📚 राजयोग कोर्स का छठवाँ दिन

🔮 84 जन्मों की सीढ़ी का चित्र देखें। चित्र में 84 जन्मों को 84 सीढ़ियों के रूप दिखाया हैं चित्र जरूर देखें

1️⃣ सीढ़ी का पहला चरण – सतयुग

👤 सतयुग में – 8 जन्म
📋 1250 वर्ष
श्री लक्ष्मी- नारायण का दैवी मर्यादा युक्त राज्य
🤴🏻 देवता वर्ण
🌕 16 कला सम्पूर्ण
🌻 सूर्यवंशी घराना
🦚 सतोप्रधान स्तिथि

▩ सबसे पहले जो यह दुनिया थी इसको सतयुग कहा जाता था।यहाँ पर श्री लक्ष्मी- नारायण का राज्य था लेकिन क्या कभी आपने लक्ष्मी-नारायण के माँ- बाप कौन हैं? उनका बचपन क्या है? कभी सुना ? क्या दिखाते हैं कही पर ? लेकिन राधे कृष्ण की सारी बाल लीलाएं उनका बचपन सब दिखाया जाता है। एक आरती आपने सुनी होगी। श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव।
जो श्रीकृष्ण हैं वही स्वयंवर के बाद नाथ नारायण बनते हैं।श्रीकृष्ण और श्रीराधे ही स्वयंवर के बाद श्री लक्ष्मी- नारायण कहलाते हैं।देखिए राधे का श्रीकृष्ण के साथ इतना प्रेम दिखाते हैं कि कहते राधे-राधे पुकारो तो चले आएंगे बिहारी।इतना प्यार दिखाते हैं जो राधे श्रीकृष्ण से अलग नहीं और श्रीकृष्ण राधे से अलग नहीं और फिर क्या दिखाते हैं श्रीकृष्ण मथुरा चले गए और राधेजी रोती रह गयी । राधे का बाद में कही कोई अस्तित्व नहीं दिखाते।
फिर रुकमणी,भामा और सब दिखाते हैं। आप सोचिये इतना जो श्री कृष्ण को प्यार करने वाली हैं उसका अस्तित्व ऐसे ही लुप्त हो जाएगा क्या❓
शास्त्रों में ऐसे ही लुप्त इसलिए हो गया क्योंकि शास्त्रों में ये बात लुप्त हो गयी की श्री कृष्ण और श्री राधे का स्वयंवर होता है और स्वयंवर के बाद श्री कृष्ण राज गद्दी पर बैठते हैं और उनका नाम परिवर्तन हो श्री नारायण हो जाता है और श्री राधे भी राज गद्दी पर बैठती हैं और उनका नाम परिवर्तन हो श्री लक्ष्मी हो जाता है। तो सतयुग में श्री लक्ष्मी-नारायण का राज्य होता है। विश्व महाराजा श्री नारायण और विश्व महारानी श्री लक्ष्मी और यहाँ(सतयुग में) एक आत्मा के 1250 वर्ष में 8 जन्म होते हैं और 150 वर्ष की आयु होती है।इसीलिए देवताओं को ‘अमर’ कहते हैं। अमर का मतलब ये नहीं कि कभी मरेंगे ही नहीं। लेकिन अमर का मतलब है वहाँ अकाले मृत्यु नहीं होती, वहां कभी बूढ़े नहीं होते इसलिए देवी देवताओं को कभी बूढ़ा नहीं दिखाते हैं। 150 वर्ष से पहले शरीर नही छोड़ते। 150 वर्ष के बाद वो स्वेच्छा से शरीर छोड़ देते हैं। इसलिए सतयुग को अमरलोक भी कहा जाता है।

◼️ आजकल तो मृत्यु का कोई भरोसा ही नहीं है । माँ-बाप बैठे हैं, दादा -दादी बैठे हैं। पोते- पोती चल बसते हैं। आज तो वो समय आ गया है।इसलिए यहाँ भय भी है। 150 वर्ष के बाद वहाँ (सतयुग में) स्वेच्छा से समय आने पर शरीर छोड़ते इसलिए न वहाँ दुःख है, न वहाँ भय है। ऐसी वो सुख की दुनिया है, निर्भय दुनिया है।

◼️ हम देवताओं की महिमा गाते हैं कि वो सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम, अहिंसा परमो देवी-देवता धर्म है। यह देवताओं की महिमा में हम गाते हैं तो सतयुग में हम सर्वगुण सम्पन्न 16 कला सम्पूर्ण होते हैं। अब 16 कला क्या होती है? कोई 16 गिनती की बात नहीं है लेकिन आत्मा की सम्पूर्ण प्यूरिटी को, सम्पूर्ण पवित्रता को, सम्पूर्ण शुद्धता को 16 डिग्रियों के रूप में बाट दिया। जैसे अगर कोई बात पूर्ण सत्य होती है तो हम कहते हैं ये बात 16 आने सच है। माना 100 % सत्य है। इसी तरह कहा आत्मा 16 कला सम्पूर्ण है। माना 100% वो प्योर है माना सम्पूर्णता का प्रतीक है।
इसी तरह चंद्रमा जब पूरा हो जाता है तो हम कहते हैं 16 कला सम्पूर्ण खिला हुआ है। वहाँ आत्मा जो बिल्कुल गुणों में शक्तियों में सम्पन्न हो रहती है। किसी तरह का भी विकार वहाँ नहीं होता।मनुष्य मर्यादा में थे, इसलिए प्रकृति भी मर्यादा में थी और सुख देने वाली थी।

◼️ आज देखो प्रकृति भी दु:खदाई हो गई है। इसलिए कही बाढ़ आ रही, कही भूकम्प आ रहा, कही बारिश हो रही और कही अकाल पड़ रहा है। कही ज्यादा ठंड पड़ रही, कही ज्यादा गर्मी पड़ रही है। प्रकृति भी दुःख दे रही क्योंकि मनुष्यों ने मर्यादा तोड़ी तो प्रकृति भी दुःखदाई हो गई। दूसरा हम देवी देवताओं की महिमा में कहते मर्यादा पुरुषोत्तम अहिंसा देवी-देवता धर्म है। एक तरफ हम *अहिंसा परम धर्म है ये बोलते हैं देवताओं को, दूसरी तरफ हम देवताओं को हिंसक दिखाते हैं देवताओं की दुनिया का गायन है कि यहाँ शेर बकरी भी एक घाट का पानी पीते थे। जब जानवरों में इतना प्यार था तो इंसानों में कितना प्यार होगा।ऐसी वो सतयुगी दुनिया होती है लेकिन जैसे की आप सभी को पता होगा- परिवर्तन प्रकृति का नियम है, Change is the Universal Truth यानि कोई भी चीज़ एक जैसी नहीं रहती हर चीज़ परिवर्तन शील है , परमात्मा के अलावा, जैसे एक बैटरी है उसको आपने फुल चार्ज कर लिया लेकिन आप उस बैटरी को यूज़ करेगें तो धीरे-धीरे उसकी पॉवर कम होती जाती तो इसी तरह सतयुग में आत्मा रूपी बैटरी भी फुल चार्ज होती गुणों से, शक्तियों से सम्पन्न होती लेकिन उसने 8 जन्म लिए कर्म में आई, कार्य व्यवहार में आई तो उसकी शक्ति खर्च हुई, यानि शक्ति कम हुई।

2️⃣ सीढ़ी का दूसरा चरण – त्रेतायुग

👤 त्रेतायुग में -12 जन्म
📋 1250 वर्ष
🚩 मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम- सीता का चक्रवर्ती राज्य
🏹 क्षत्रिय वर्ण
🥈 14 कला
👑 चन्द्रवंश
🌝 सतो स्तिथि

◼️ सतयुग के 1250 वर्ष बीत जाने के बाद त्रेतायुग शुरू होता है। यहाँ आत्मा की कलाएं 16 से घट कर 14 कला रह जाती है। थोड़ी सी कम हो जाती है। त्रेतायुग को चंद्रवंशी घराना कहते हैं। यहाँ आत्मा के 12 जन्म होते हैं। 125 से 150 के बीच की आयु हो गई आयु थोड़ी कम हो गयी इसलिए जन्म बढ़ गये। यहाँ (त्रेतायुग में) भी एक धर्म, एक भाषा यह सब होता है बहुत सुख-शांति की दुनिया होती है। सतयुग से त्रेतायुग तक बहुत सुख की दुनिया होती है। बस फर्क इतना होता की सतयुग में आत्मा 16 कला होती और त्रेतायुग 14 कला हो जाती हैं

3️⃣ सीढ़ी का तीसरा चरण – द्वापरयुग

👤 द्वापरयुग में – 21 जन्म
📋 1250 वर्ष
📿 अव्यभिचारी भक्ति
🔹 वैश्य वर्ण
🔘 8 कला
👨🏻‍🦲 वैश्य वंशी
🔶 रजोप्रधान स्तिथि

◼️ फिर आया द्वापर युग, 1250 वर्ष (सतयुग के) और 1250 वर्ष (त्रेतायुग के) तो कुल 2500 वर्ष आत्माओं को पार्ट बजाते हो गये। मिसाल के तौर पर हम देखो सफ़र में जाए बिल्कुल हम साफ़ सुथरे कपड़े पहनेंगे, ट्रेन में बैठे हैं, जर्नी कर रहे हैं। हम जब सफर करके उतरेंगे क्या उतने ही साफ़ कपड़े होंगे?? यात्रा के दौरान धूल मिट्टी जम जाती कपड़ो पर ।
तो ऐसे ही यह भी आत्मा की यात्रा है 2500 वर्ष से वो पार्ट प्ले करती आ रही है तो उसकी भी तो पॉवर कम होगी ना। तो साथ साथ उसकी भी पॉवर खर्च होती जा रही है। सतयुग से त्रेतायुग के अंत तक 33 करोड़ जनसंख्या होती है। उसके बाद द्वापरयुग से और आत्माएं परमधाम से नीचे उतरती रहती हैं। और जो आत्माएं त्रेतायुग से द्वापरयुग में प्रवेश करती हैं पर अब आत्माएं दैवी घराने के नहीं रही उनकी दिव्यता ख़त्म हो गयी और अब वो मनुष्य आत्मा कहलाने लगी।

◼️ हमारे भारत वर्ष में 33 करोड़ देवी- देवताओं का गायन और पूजन होता है। आज वो 33 करोड़ देवी-देवतायें गए कहाँ?? कही और नहीं गए। वो सब पुनर्जन्म लेते-लेते नीचे आ गए। लेकिन वहाँ तो सर्वगुण सम्पन्न थे वहाँ फुल पॉवर में थे तो देवता कहलाते थे।

◼️धीरे-धीरे उनकी पॉवर कम होती गई।सतयुग में 16 कला थे,त्रेतायुग में 14 कला और द्वापरयुग में 8 कला रह गई। आत्मा की आधी पॉवर कम हो गई, द्वापर युग में आते-आते। द्वापर में जब आधी पॉवर कम हो जाती है। कोई भी चीज़, कोई कमज़ोर व्यक्ति होगा थोड़ी सी ठंड आयेगी उसको सर्दी ज़ुखाम हो जाएगा। थोड़ी गर्मी आएगी तो लू लग जाएगी । लेकिन जो मजबूत व्यक्ति होता है, स्वस्थ व्यक्ति होता है उसके ऊपर इतनी जल्दी किसी भी चीज़ का इफ़ेक्ट नहीं पड़ता। इसी तरह वहाँ तो (सतयुग में) बिल्कुल परफ़ेक्ट थे।यहाँ(द्वापरयुग में) जब कमज़ोर होने लगे आत्मा की आधी पॉवर कम होने लगी तो क्या हुआ? उसके ऊपर विकार और बुराईयों का प्रभाव आना शुरू हो गया।

◼️ जब बुराईयां जीवन में आई तो जो सच्ची मन की शांति थी वो ख़त्म हो गई। जहाँ ज़रा सी अशुद्धि मन में आई वही सच्ची शांति मन की खत्म। मन की शांति खत्म होने लगी तो हमें भगवान की याद आई तब कहते हैं दुःख में सिमरन सब करें सुख में करे न कोई। सतयुग, त्रेता तो सुख की दुनिया थी वहाँ भगवान को याद नहीं करते थे।लेकिन जब द्वापरयुग आया मन के ऊपर बुराईयों का प्रभाव आने लगा तो हमें भगवान की याद आई। द्वापर से पूजा, भक्ति करनी शुरू हुई। सबसे पहले सोमनाथ का मन्दिर राजा विक्रमादित्य ने बनवाया जहाँ पर परमात्मा शिव की शिवलिंग के रूप में पूजा शुरू की। तो वहाँ (सतयुग में) 8 जन्म थे, फिर (त्रेतायुग में) 12 जन्म हुए यहाँ पर द्वापर युग में 21 जन्म हो गए। द्वापर युग में एक आत्मा के 21 जन्म । जन्म बढ़ रहे हैं आयु कम होती जा रही है। 21 जन्म हो जाते हैं, 8 कलाये रह जाती हैं और यहाँ द्वापर युग में पूजा भक्ति होनी शुरू होती है।

◼️ पहले परमात्मा शिव की पूजा शुरू की फिर श्री राधा-कृष्ण फिर श्री लक्ष्मी-नारायण फिर श्रीराम-सीता। किसी ने कहा – इनकी पूजा करो तो ये प्राप्ति होगी, किसी ने कहा – उनकी पूजा करो तो ये प्राप्ति होगी। यह सब हमनें करना शुरू किया। फिर उनकी मूर्तियां रखी मनोकामना मांगी की मेरे बेटा हो जाये, बेटा हो गया तो मेरे लिये तो यही भगवान है और बेटी हो गयी तो, राम की पूजा नहीं, आप देवी माँ की पूजा करो तो होगा। किसी ने कहा इनकी पूजा करो, किसी ने कहा- नहीं, इनकी नहीं उनकी पूजा करो। इस तरह पूजा भक्ति बढ़नी शुरू हो गई। द्वापर युग में ही वेद, शास्त्रों की रचना शुरू हुई। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है वैसे-वैसे इसका इलाज़ पूजा, भक्ति, वेद-शास्त्र ये सब हमनें अपनाने शुरू किये।जैसे-जैसे मन की अशांति हुई तो नए-नए ख़ोज करनी शुरू की।

◼️ भगवान मिल जाये, शांति मिल जाए।किसी तरह मन की बुराई ख़त्म हो जाये भगवान के समीप आये मन में शांति आये।इसके हमने नए- नए तरीके खोजने शुरू किये।हम कहते है कि फलाने महात्मा ने कहा था कि ऐसा कलयुग आएगा, ऐसा समय आएगा ” जो हंस चुगेगा दाना कौआ मोती खायेगा”आज बिल्कुल वैसा ही समय आ गया है। उन्होंने बिल्कुल सच कहा था। आज के समय को देख आप भी यही कहेंगे । उस समय जो महान आत्माएं थी उस समय उनको ये मालूम था कि मनुष्य बुराई की तरफ बढ़ रहा है तो उन्होंने मानव के कल्याण के लिए (ताकि बुराई से बच जाये) उन्होंने जब वेद शास्त्रों की रचना की तो कुछ इस तरह की बातें डाल दी। देखो अगर पाप कर्म करोगे तो 84 लाख योनियां भोगनी पड़ेगी। देखो भाई, पाप कर्म करोगे तो कुत्ता, बिल्ली बनना पड़ेगा ताकि मनुष्य के मन में थोड़ा भय रहे, डर रहे। जैसे एक माँ कहती है ना उधर नहीं जाना नहीं तो भूत खा जाएगा। अब ऐसा तो नहीं है ना की भूत खा जाएगा। लेकिन वो उधर शरारत न करें, उधर न जाए तो उसे रोकने के लिये कह देती है।

◼️ इसी तरह जो विद्वान हुए, ऋषि-मुनि हुए उन्होंने हमारे कल्याण अर्थ वेदो-शास्त्रों में कुछ इस तरह की बातें डाल दी। देखो भाई अगर पाप कर्म करोगे तो ऐसे 84 लाख योनियां भोगनी पड़ेगी या भाई देखो पाप कर्म करोगे तो भगवान देख रहा वो सब जगह है। कहा तो इसलिए था ताकि हम डर जाये, पाप कर्म करने से बच जाए लेकिन हमने उनके भाव को तो समझा नहीं उन्होंने किस भाव से फलानी जगह ये बात लिखी लेकिन हमने केवल शब्दों का अर्थ पकड़ लिया। किसी ने उसे कुछ एक्सप्लेन किया, किसी ने और कुछ एक्सप्लेन कर दिया। आज शास्त्र तो बहुत है। लेकिन (जीवन में) प्रैक्टिकल में कुछ नहीं है क्यों नहीं है?? क्योंकि उन्होंने जिस भाव से लिखा था उस भाव को हमने समझा नहीं। हम कहेगें- बहन जी, फलाने शास्त्र में तो ये लिखा है।बहनजी फलानी जगह तो ये लिखा है, अरे ! उन्होंने लिखा किस भाव से था वो समझने की कोशिश की किसी ने। उन्होंने हमारे कल्याण के लिए वास्तव में वो बातें लिखी थी।इसलिए ये इतने वेद शास्त्र होते भी भारत की हालत देखो क्या है? भारत जो जगत गुरु था आज उसकी हालत देखो क्या है❔

4️⃣ सीढ़ी का अंतिम चरण – कलयुग

👤 कलयुग – 42 जन्म
📋 1250 वर्ष
📿 व्यभिचारी भक्ति
🙎🏻‍♂️ शुद्र वर्ण
◼️ कलाहीन
⭕ शुद्र वंश
😡 तमोप्रधान स्तिथि

◼️ फिर क्या हुआ भक्ति भी धीरे- धीरे बिल्कुल तमोप्रधान हो गयी कलयुग में भक्ति के नाम पर बलि चढ़ाना, नदियों की, चौराहों की, पेड़-पौधों की, गुरुओं की, सूरज चाँद की पूजा शुरू कर दी। यहाँ तक की मनुष्यों को भी पूजना शुरू कर दी। खेत में दो ईंट रखकर उनको भी पूजना शुरू कर दिया।भक्ति भी बिल्कुल तमोप्रधान हो गयी। कलयुग में जब बिल्कुल भक्ति तमोप्रधान हो जाती है, दुनिया के अंदर पाप भृष्टाचार बढ़ जाता है, जब साधू- समाज सबने कोशिश करके देख ली दुनिया नहीं सुधरती है तब स्वयं भगवान को इस सृष्टि पर आना पड़ता है और भारत जो सोने की चिड़िया था।गाते थे जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा…।इतना श्रेष्ठ था आज वो कंगाल हो गया विदेशों से कर्ज ले रहा है ऐसी हालत हो गयी है।इसलिए गाते देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान … जब ऐसी हालत हो जाती है तो स्वयं भगवान को आना पड़ता है। तो इस तरह यहाँ (कलयुग में) 42 जन्म है कलयुग में क्योंकि यहाँ जल्दी-जल्दी मरते रहते हैं ,जल्दी- जल्दी जन्म लेते रहते हैं इसलिए जन्म बढ़ गए, आयु कोई भी निश्चित नहीं पैदा होते भी मर सकते हैं, किसी जन्म में 80 या 90 वर्ष के भी होके मर सकते हैं कोई भरोसा नहीं। इसलिए जन्म की संख्या बढ़ गयी 42 कलयुग में।( चित्र में देखें) सतयुग में 8 जन्म थे, त्रेतायुग में 12 जन्म थे, द्वापर युग में 21 जन्म और कलयुग में 42 जन्म हो गए ।तो यहाँ अभी धरती पर 700 करोड़ से भी ऊपर मनुष्य जनसंख्या है। वहाँ सतयुग में सारे विश्व की आबादी शुरू में 9 लाख।आज जो सारे विश्व की आबादी देखें कितनी है जब ऐसा समय हो जाता है तब स्वयं परमात्मा आते हैं और परमात्मा आकर एक साधारण मानव तन में प्रवेश करते हैं जिसका नाम रखते हैं ” प्रजापिता ब्रह्मा” तथा उन
की मुख-वंशी कन्या का नाम “जगदम्बा सरस्वती” रखा है। इस प्रकार देवता-वंश की अन्य आत्माएं भी 5000 वर्ष में अधिकाधिक 84 जन्म लेती है।

◼️ इसलिए भारत में जन्म-मरण के चक्र को “चौरासी का चक्कर” भी कहते है और कई देवियों के मंदिरों में 84 घंटे भी लगे होते हैं तथा उन्हें “84 घंटे वाली देवी” नाम से लोग याद करते हैं।

◼️ परमात्मा इसी, प्रजापिता ब्रह्मा के तन में आकर फिर से हम मनुष्यों को ज्ञान-योग के द्वारा श्रेष्ठ बनाने , पवित्र बनाने का कार्य करते हैं क्योंकि यात्रा पूरी हुई अब वापिस घर चलना है जो शान्तिधाम, मुक्तिधाम,परमधाम हमारा घर है ना। हम घर से आये थे ऐसी सुंदर दुनिया में लेकिन आज क्या हालत हो गई अब फिर से भगवान वापिस घर ले जाने के लिये आये हैं क्योंकि ये दुनिया रहने लायक़ नहीं रही है। अब भगवान कहते- बच्चे, चलो वापिस घर। अब फिर नई दुनिया बनाने मैं तुम्हारे लिये आया हूँ।तो ये लास्ट समय है जब दुनिया की बिल्कुल ऐसी हालत हो जाती है तो इस पुरानी सृष्टि का प्राकृतिक आपदाएं, परमाणु बम (तीसरा विश्व युद्ध) और गृह युद्ध के द्वारा विनाश होता। वो समय अब आ पंहुचा है।

◼️ परमधाम मुक्तिधाम जो हमारा घर था यहाँ कोई भी अपवित्र आत्मा नहीं जा सकती।इसलिए हम भगवान के पास नहीं पहुँच सकते । हम कई बार कह देते कोई भी रास्ता अपना लो पहुँचना तो भगवान के पास ही है भगवान कहते – तुम मेरे पास नहीं पहुँच सकते क्योंकि तुम इतने पतित हो गए, तुम इतने गन्दे हो गए कि तुम मेरे पास नहीं आ सकते। क्योंकि हमारा जो घर है वो बिल्कुल पवित्र घर है इसलिए भगवान को वहाँ से यहाँ आना पड़ता है हमें शुद्ध बनाकर वापिस ले जाने के लिये।

◼️ तो इस समय परमात्मा आकर हमें शुद्ध बनाकर लेकर जाता। अब जो आत्माएं पावन बनती है, शिव पिता परमात्मा द्वारा सिखाए ज्ञान-योग के द्वारा अपने जीवन को पवित्र बनाती है वो परमधाम होकर इस पवित्र दुनिया सतयुग में फिर से आती हैं । भगवान लेने आए तो सभी को लेकर जाएंगे एक साथ। जाना तो सबको है इसलिए शिव का जो मन्दिर है उज्जैन में वो है महाकालेश्वर का मन्दिर। इस समय भगवान महाकाल के रूप में आते हैं और कहते हैं तुम चाहो, ना चाहो, तुम्हारी मर्जी हो या ना हो लेकिन अब मैं सबको वापिस जरूर लेकर जाऊँगा। लेकिन जाने के दो रास्ते है प्यार से या मार से।

🙎🏻‍♂️ कैसे जाना पसन्द करेगें ❓

◼️ भगवान कहते है प्यार से, तो जो मैं रास्ता बताता हूँ वो सहज बताता हूँ, मुश्किल रास्ता बिल्कुल नहीं बताता हूँ क्योंकि वो हमारा बाप है ऐसी आज्ञा देता है जिसे हम कर सकें इसलिए सहज रास्ता बताते। मुश्किल रास्ता हो तो कोई पार नहीं कर पाए तो भगवान की आज्ञा की अवज्ञा हो जाये। वो भी पाप है इसलिए भगवान ऐसी आज्ञा नहीं देते जिसे हम नहीं कर सके, ऐसी आज्ञा देते है जिसे हम सहज कर सकें। तो इस समय परमात्मा आकर रास्ता बताते। तो उसके बताये हुए रास्ते पर हम चलकर अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं। तो ऐसी दुनिया में हम जाने के अधिकारी बन जाते हैं। ये एक रास्ता परमात्मा बताते हैं। अब जाना तो सबको है। तो दूसरा रास्ता हुआ सज़ाएं खाकर परमधाम जाना। ज्ञान योग से अपने कर्मों का हिसाब चुकतु कर पावन बन जाएंगे तो सज़ा नहीं खानी पड़ेगी । मगर अगर दूसरा रास्ता अपनाएंगे तो जो हमने कर्म किये वो तो भोगने पड़ेंगे ना । तो सजाये खाकर चुक्तु करके यहाँ ( परमधाम में) जाकर बैठेंगे। मगर दूसरा रास्ता अपनाएंगे तो सतयुग- त्रेतायुग में नहीं जा पाएंगे। जाना सबको है तो बेहतर होगा भगवान के दिखाए रास्ते पर चल अपने को पावन बना परमधाम जाएं और वहां से फिर सतयुग-त्रेतायुग में आए ये हुआ जीवनमुक्ति और अगर दूसरे रास्ते से गए तो मार खाकर परमधाम जाएंगे और वहां से सतयुग-त्रेतायुग में नहीं आ पाएंगे फिर सीधा द्वापर या कलयुग में ही आएँगे तो ये हुआ जीवनबंध।

◼️ तो जो परमात्मा को पहचान उनके मार्ग पर चल अपने को पावन बनाते हैं उन्हें परमात्मा द्वारा मुक्ति (परमधाम) और जीवनमुक्ति(स्वर्ग) दोनों वर्से मिलते। मगर है तो सभी आत्माएं परमात्मा की संतान तो दूसरे रास्ते पर चलने वालों को सिर्फ मुक्ति (परमधाम) वर्से में मिलती और वो भी सदाकाल के लिए नहीं सिर्फ 2500 वर्ष तक जबतक सतयुग और त्रेतायुग चलता।

◼️ तो इस तरह से 8 जन्म सतयुग के , 12 जन्म त्रेतायुग के, 21जन्म द्वापरयुग के 8+12+21=41 और 42 जन्म कलयुग के यानि 41 + 42= 83 जन्म और एक जन्म ये संगम का। 84 वा जन्म और यह संगमयुग का जो जन्म है उसे कहते है लख 84 के बाद बड़े भाग्य से मिलता है। इन 84 जन्मों में ये संगमयुगी जन्म बड़े भाग्य से मिलता है यह जन्म बहुत ही भाग्यशाली आत्माओं को प्राप्त होता है। जो सृष्टि पर आये हुए परमात्मा को पहचानकर अपने जीवन को दिव्य श्रेष्ठ बनाती हैं वो इस सृष्टि में महान भाग्यशाली आत्माएं हैं।

◼️ कोई भी अपने जीवन को ऐसा बनाकर अपना भाग्य बना सकता है और जो संगमयुग पर परमात्मा को पहचानकर अपने जीवन और आत्मा को श्रेष्ठ बनाते हैं वही सतयुग में आते हैं तो सतयुग , त्रेतायुग 2500 वर्ष तक इतना सुख का जीवन बीतता है जो जीवनमुक्ति कहलाता है।

◼️ जीवन होता है लेकिन हर तरह की विकार बुराईयों से यहाँ मुक्त होते हैं।इसलिए इसको जीवन होते हुए भी मुक्ति में है, जीवनमुक्ति कहलाती है।
अब सबके 84 जन्म नहीं होते। ज्यादा से ज्यादा किसी के 84 जन्म और कम से कम किसी का एक जन्म भी होता है। इसलिए जो हीरो एक्टर होता है वो शुरू से लेकर लास्ट तक होता है और हीरो की ही जीत होती है। विलयन टाइप तो बीच में आते हैं। तो सतयुग त्रेता तो इस सृष्टि के जो हीरो अर्थात जो पवित्र आत्माएं हैं वो आती है सतयुग में। वहाँ 9 लाख(सतयुग के शुरू में) वहाँ 33 करोड़(त्रेता के अंत तक) सब एक साथ नहीं आते यही कारण है सृष्टि में जनसंख्या बढ़ती जा रही है इतना बर्थ कंट्रोल करने की गवर्नमेंट कोशिश कर रही लेकिन नहीं हो पा रहा। जनसंख्या तो दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

◼️कहा से आ रही है आत्माएं। आत्मा तो न मरती है ना मिटती है, ना उसका जन्म होता है न मृत्यु। तो कही ज़रूर उनका स्टॉक है जहाँ से आ रही हैं। क्या आपके महौल्ले की आबादी इतनी ही थी, आज से 20 या 25 साल पहले?? नहीं ना। तो आप सोचो कहा से ये भीड़ बढ़ रही है इस दुनिया में। पहले तो इतनी जनसंख्या नहीं थी। (चित्र में देखें) परमधाम से आते जा रहे हैं , सब एक साथ नहीं आते हैं। पहले सतयुग में केवल 9 लाख होती है जो पवित्र आत्माएं होती जो अभी अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाती वो सतयुग में आती। फिर लेकिन जिन्होंने सुना, बीज पड़ गया यकीन हुआ मगर अपने जीवन में अप्लाई नहीं किया तो वो त्रेता के अंत तक आती हैं।

◼️ लेकिन जिन्होंने नहीं समझा इस चीज़ को फिर भी दुनिया में कुछ अच्छे कर्म करने वाले इंसान हैं तो वो द्वापर से आये लेकिन जो बिल्कुल ही पाप आत्माएं हैं वो कलयुग में उतरती है। वो सतयुग, त्रेता , द्वापर में नहीं आती। वो कलयुग में ही आती और यहाँ ही 2 या 4 जन्म लिये, सुख भोगा, सजाये खाई, जाके वहाँ (परमधाम) बैठ गई। वापस फिर यही उतरेंगी अपने टाइम पर। इसलिए पहले जनसंख्या कम होती है फिर बढ़ जाती है और जो सतयुग शुरू से आते हैं आधाकल्प तो पूर्ण रूप से सुख पाते हैं और द्वापर में भी बहुत सुखी होगें। कलयुग में आकर थोड़ा दुःख मिलेगा और तभी उन्हें भगवान की प्राप्ति हो जायेगी यानि जो अभी पहचानते है भगवान को वो नई दुनिया में आयेंगे।

◼️ इस 5000 वर्ष के चक्र में हमारे इस तरह 84 जन्म होते हैं। अभी वो समय चल रहा है। वहाँ भी राजा- रानी, प्रजा दास-दासियां सब हैं।यह हमारे ऊपर डिपेंड करता है कि हम कितनी मेहनत करते हैं। उतना ही श्रेष्ठ पद पाने के अधिकारी बनते हैं। इस तरह हमारे 84 जन्म होते हैं। ना कि 84 लाख योनियां। अब तो नहीं कहेगें ना कि जानवर की योनि में जायेंगे या जाना पड़ेगा।

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🌳 कल्पवृक्ष 🌳

◼️ सृष्टि रूपी उल्टा, अद्भुत वृक्ष और उसके बीजरूप परमात्मा (कल्पवृक्ष)

📚 गीता में वर्णन आता है *मैं अनेक धर्मों का विनाश कर एक सत्य धर्म की स्थापना करता हूँ….. वो एक धर्म है आदि सनातन देवी देवता धर्म यह सबसे प्राचीन धर्म है और सबसे श्रेष्ठ , पावन, सबसे सुखदाई धर्म भी है।

◼️ चित्र में कल्प वृक्ष दिखाया है। गीता के अंदर भी आता है कि हे अर्जुन- मैं इस उल्टे कल्प वृक्ष का, मनुष्य रूपी झाड़ का बीजरूप हूँ। वैसे तो बीज नीचे होता है और वृक्ष ऊपर होता है लेकिन इसे समझाने के लिए सीधा दिखाया है वैसे ये उल्टा कल्प वृक्ष है क्यों???
क्योंकि इसका बीजरूप जो परमात्मा है वो ऊपर है और ये मनुष्य सृष्टि नीचे है इसलिए कहा है कि इस मनुष्य सृष्टि रूपी उल्टे कल्प वृक्ष का मैं बीजरूप हूँ तो ये समझाने के लिए सीधा दिखाया है।

◼️ चित्र में सबसे नीचे संगमयुग दिखाया है। यहाँ पर परमात्मा ब्रह्मा के द्वारा एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं।आदि सनातन देवी-देवता धर्म जो सतयुग और त्रेतायुग 2500 वर्ष चलता है।आदि सनातन ये खाली आदि सनातन धर्म नहीं होता है पूरा नाम हैं आदि सनातन देवी-देवता धर्म। यहाँ पर एक धर्म, एक भाषा, एकमत और एककुल होता हैं। जैसे कहते हैं धर्म में शक्ति होती हैं। Religion is might कहते हैं। तो यहाँ एक धर्म था तो शक्ति थी।आज धर्म के अंदर शक्ति हैं क्या???

◼️ आज धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़े, ईर्ष्या, नफ़रत ये सब हो रहा है। तो यहाँ पर एक धर्म था तो सुख-शांति, पवित्रता, आनन्द, सुख सब था। बहुत सुखी दुनिया थी लेकिन धर्म का मतलब होता हैं धारणा। आदि सनातन देवी-देवता धर्म माना जब मनुष्य दिव्य गुणों से सम्पन्न है तो वो देवी- देवता कहलाता था। लेकिन मनुष्यों से धर्म बनता। मनुष्यों में कमी है तो धर्म में भी कमी। जब यहाँ मनुष्य दिव्य गुणों से सम्पन्न थे तो ये नई दुनिया देवी-देवता धर्म कहलाती थी। सतयुग, त्रेतायुग 2500 वर्ष चला लेकिन गिरावट तो आती है। हर नई चीज़ पुरानी तो होती है ये धर्म 2500 वर्ष चला। 2500 वर्ष के बाद धीरे- धीरे इसमें गिरावट आती चली गई। तो जब हमने ऊपर से पार्ट बजाते- बजाते द्वापर युग में प्रवेश किया तो द्वापर में क्या हुआ बुराईयों का प्रभाव आना शुरू हो गया अब जब बुराई हमारे अंदर आई तो हम आने आपको देवी- देवता नहीं कहला सकते देवतायें माना जो सम्पूर्ण हैं, सम्पूर्ण निर्विकारी हैं, सर्वगुण सम्पन्न हैं, उन्हें कहा जाता है देवता। जब कमियां आने लगी तो देवता तो नहीं कहला सकते।इसलिए यहाँ पर जो आदि सनातन देवी-देवता धर्म था वो खाली आदि सनातन धर्म रह गया। उसमें से देवी-देवता अक्षर कट हो गया। ये भी सृष्टि का नियम है कि जब- जब धर्म में कमी आई तब-तब कोई न कोई महान आत्माएं आती रही। देवी-देवता धर्म में कमी आई तो….

◼️ आज से 2500 वर्ष पहले इब्राहिम आये और इनकी भी लाइफ हिस्ट्री दिखाते हैं कि इब्राहिम जो हैं एक किन जैसे ही क्राइस्ट गये आज वही क्रिश्चियन आपस में लड़ रहे है।मुख्य दो पंथ में विभाजित हुए। कैथेस्टर और प्रोटेस्टर।

◼️ फिर इसके बाद धीरे- धीरे शंकराचार्य आये।शंकराचार्य ने देखा कि ऋषि, मुनि भी विलासी होने लगे तो उसने सन्यास मार्ग स्थापन कर हिन्दू धर्म को पुनः जीवित किया।
लोगों में वैराग्य लाने के लिए और भी उन्होंने बातें कही है जैसे की नारी नर्क का द्वार है, नारी सर्पणी है लेकिन यह बातें सत्य नहीं है। वास्तव में जीवन जी रहे है, संसार वास्तविक है उसको मिथ्या कैसे कह सकते हैं लेकिन उन्होंने जो बात कही वह सैद्धान्तिक रूप से सत्य नहीं थी।अगर जगत मिथ्या है तो अपने को जगतगुरु कहलाने वाले वह स्वयं ही मिथ्या है। सन्यास मार्ग जो शुरू हुआ उसमें मुख्य त्याग की भावना सिखाई।

◼️ कल्प वृक्ष में जैन धर्म नहीं दिखाया है क्योंकि वह हिन्दू धर्म का ही एक मार्ग है। जैन कोई धर्म नहीं है। जैन माना जाता जितेंद्रिय स्थिति माना अपने इंद्रियों पर जीत प्राप्त करने का मार्ग।

◼️ गुरुनानक जी आते हैं सिख धर्म की स्थापना करते हैं और मानव को भाईचारा👬 सिखाते है।

◼️ इस तरह अनेक मठ पंथ दुनिया में हो गये। आज अनेक मठ पंथ हो गये अनेक धर्म हो गये। धर्म के अंदर ताकत हो, हम चाहते सब मिलकर एक हो जाये, शांति हो जाए लेकिन यह असंभव है , जहाँ अनेक बर्तन होंगे वहाँ आवाज तो होगी ही। तो इस प्रकार हम देखते हैं कि सतयुग और त्रेतायुग में आदि सनातन देवी देवता धर्म होता है। द्वापर युग में देह धर्म होता है और कलयुग में धर्म भी अधर्म में बदल जाता है। फिर से सुख-शांति के लिए एक उपाय है अनेक धर्मो का विनाश और एक धर्म की पुनः स्थापना ।जो श्रीमद् भगवद् गीता के अंदर कहा गया है कि मैं अनेक धर्मो का विनाश करके एक सत्य धर्म की स्थापना करता हूँ वो कौनसा धर्म है यही आदि सनातन देवी-देवता धर्म हैं। अनेक धर्मो का विनाश कर एक देवी-देवता धर्म की स्थापना स्वयं परमात्मा आकर करते हैं।
तो आप सोचिए क्राइस्ट नहीं आये उससे पहले क्रिश्चियन धर्म था क्या?? नहीं । महात्मा बुद्ध नहीं आये उससे पहले बौद्ध धर्म था क्या?? नहीं। इब्राहिम नहीं आये उससे पहले मुस्लिम धर्म था क्या?? उससे पहले क्या था?? आदि सनातन देवी-देवता धर्म था।ये सब उसी से निकली टाल- टालिया हैं और देखो इसलिए दिखाते टाल टालियों को कोई भी तोड़ सकता लेकिन इस तने को तोड़ सकता है?? इस तने को तो बड़ी मेहनत से काटना पड़ता हैं।इसमें ताकत है क्योंकि एक है।आज अनेकता में बटने से विश्व शक्तिहीन हो गया। इसलिए परमपिता परमात्मा अनेक धर्मो का विनाश कर फिर से एक धर्म की स्थापना के लिए आये हैं।

◼️ अब देखिये ईसा को मानने वाले ईसाई कहलाते हैं बौद्ध को मानने वाले बौद्धि कहलाते हैं क्राइस्ट को मानने वाले क्रिश्चियन कहलाते हैं।आज हम देवी- देवताओ को मान रहे, पूज रहे क्या हम देवी- देवता कहलाते हैं?? क्यों नहीं कहलाते ?? क्योंकि हमारे अंदर दिव्यगुण नहीं हैं देवतायें सम्पूर्ण निर्विकारी हैं, लेकिन आज मनुष्य हो गया विकारी। इसलिए हम देवी- देवता नहीं कहलाते लेकिन देवी- देवतायें हमारे ही पूर्वज हैं हम देवी- देवताओं की ही वंशावली के हैं ये ही हमारे पूर्वज थे।हमारा धर्म आदि सनातन देवी- देवता धर्म था और इसकी स्थापना स्वयं परमात्मा ने की थी।सत्य धर्म की आज से 5000 वर्ष पहले अब फिर से पुनः इस धर्म की स्थापना परमात्मा करते हैं क्योंकि पुनः पुनः माना जो पूर्णतया लोप नहीं हुआ।जिसकी निशानियां आज भी हैं। देवी- देवता धर्म की निशानियां आज भी हैं लेकिन और जो धर्म हैं इनका सतयुग में नाम निशान भी नहीं।ये द्वापर से ही आएंगे। देवी- देवता धर्म की आज तक भी निशानियां हैं लेकिन देवी- देवता धर्म हैं नहीं।अब परमात्मा उसी की पुनः स्थापना के लिये आये हैं।

◼️ इसमें (चित्र में ऊपर) दिखाया हैं शंकरजी के द्वारा विनाश। यादव, कौरव,पांडव तीनों के नाम दिखाते।यादवों के लिये कहते उनके पेट से मूसल निकले और अपने कुल का विनाश किया। ऐसे कोई पेट से मूसल नहीं निकलते लेकिन परमात्मा कहते हैं कि यादव हैं यूरोपवासी जो बम बना रहे हैं। पेट से नहीं निकलते मूसल लेकिन जैसे- कहते इसके पेट में कोई बात नहीं पचती। पेट में बात पचती हैं या भोजन। लेकिन ये अलंकारिक भाषा है। बात बुद्धि में नहीं ठहरती तो दूसरे को सुना देते।ये मिसाईल बुद्धि रूपी पेट से निकले अपने विनाश के लिये। कौरव माना जो भगवान से विपरीत बुद्धि हैं कहलाते हैं भाई-भाई। लेकिन आपस में ही कट-कट के मरेंगे और विनाश को पायेंगे जैसा महाभारत में बताते हैं । पांडव माना जिनकी भगवान से प्रीत बुद्धि हैं। पांडवो को कितना दिखाते 5 अर्थात मुठ्ठी भर, कौरवों

कबीले में रहते थे। उस समय क्या होता था देवी- देवताओं की मूर्ति पूजा शुरू हो गयी थी। शुरुवात इस तरह हुई जिस तरह हम अपने बड़ो का फ़ोटो रख देते हैं मन्त्र पढ़ना, फूल चढ़ाना। धीरे- धीरे उसी ने मूर्ति पूजा का रूप लेना शुरू कर दिया।कहते हैं इनके जो पिताजी थे वो एक मूर्तिकार थे। तो इनके पास में देवी- देवता का कोई मेला लगता था। सब घर वालों ने इब्राहिम को भी कहा कि आप भी चलो। इन्होंने कहा- नहीं मैं मेले में नहीं जाऊँगा।सबने बहुत कहा लेकिन इन्होंने कहा- मैं नहीं जाऊँगा तो सब घरवाले चले गये लेकिन जब वापिस आकर देखा क्योंकि इनके पिताजी एक मूर्तिकार थे। तो सभी देवी-देवताओं की जो मुर्तिया थी किसी का हाथ टूटा था, किसी का पैर टूटा था। इनके पिताजी ने कहा- अरे ये सब तुमने क्या किया।इब्राहिम ने कहा- मैंने कुछ नहीं किया हैं। कहा- घर में तो तुम अकेले ही थे और तो कोई था ही नहीं। तो ये काम किसी और ने थोड़े ही किया है ये तो तुमने ही किया। इब्राहिम ने कहा- मैंने कुछ नहीं किया ये ही आपस में लड़ रहे थे तो किसी ने किसी का हाथ तोड़ दिया, किसी ने किसी का पैर तोड़ दिया। तो इनके पिताजी ने कहा- ये जड़ मुर्तियां भला कैसे आपस में लड़ेंगी। तो इब्राहिम ने कहा- जब ये जड़ मूर्तियां अपनी रक्षा नहीं कर सकती तो हमारी कैसे करेंगी?? तो इनके पिताजी को इनकी बात जँची।तब उन्होंने कहा कि बेटा, क्योंकि उस समय देवी- देवताओं के प्रति लोगों के मन में इतनी श्रद्धा होती थी कि जहाँ भी कुछ गलत होता था तो उसको बड़ा कड़ा दंड दिया जाता था। तो इनके पिताजी ने कहा- तुम ये कबीला छोड़ दो क्योंकि इतनी मुर्तियां हैं किसी न किसी को तो पता चलेगा।तो कहते हैं इनका भतीजा था जो इनके विचारों से सहमत था। ये भेड़ बकरियां लेकर कुछ अलग स्थानों पर चले गए लेकिन इनके अंदर जो सत्य को जानने की, खोज करने की जो जिज्ञासा थी।मूर्ति पूजा में इनका विश्वास नहीं था फिर दिखाते हैं इनको ऐसा आभास हुआ जैसे किसी रूह ने मेरे में प्रवेश किया और इन्होंने ज्ञान का प्रचार और प्रसार करना शुरू किया। तो आपको बताये धर्म की स्थापना के लिये पवित्रता का बल चाहिए होता है इनके तन में एक पवित्र आत्मा ने परकाया प्रवेश किया।क्योंकि जो अभी तक खुद ख़ोज रहा था।आज ज्ञान का प्रचार कर रहा, ज्ञान की बातें सुना रहा।इनके तन में एक पवित्र आत्मा ने परकाया प्रवेश किया और इससे एक नए धर्म की स्थापना हुई फाउंडेशन पड़ गया इस्लाम धर्म।
इस्लाम का अर्थ है शांति। इस्लाम धर्म भी शांति सिखलाता है।

◼️ अब आगे आज से 2250 वर्ष पहले महात्मा बुद्ध आये।महात्मा बुद्ध को भी दिखाते हैं कि वो भी एक राजा का बेटा था और उसने भी जब दुःख देखा, मृत्यु देखी ये सब देखा तो उनके मन में भी वैराग्य आया और उन्होंने भी ये सब छोड़ा और सत्य की ख़ोज में निकल पड़े। इनको भी दिखाते इन्होंने भी अपने जीवन में गुरु किये लेकिन इन्हें सन्तुष्टता नहीं हुई तब दिखाते हैं कि गया में एक वृक्ष के नीचे जब ये बैठकर तपस्या कर रहे थे तो वहाँ एक ज्योति ने इनके शरीर में प्रवेश किया तब से महात्मा बुद्ध ने लोगों की सेवाएं करना, उपदेश देना ये सब शुरू कर दिया। ये भी कोई जादू नहीं हुआ। इनके तन में भी एक पवित्र आत्मा ने परकाया प्रवेश किया और उस पवित्र आत्मा ने ज्ञान का प्रचार और प्रसार किया। गौतम बुद्ध ने क्रियाकांड को महत्व नहीं दिया, उसने आत्मा और परमात्मा को महत्व नहीं दिया, उसने जीवन के मूल्यों के बारे में, कर्मो को श्रेष्ठ बनाने के बारे में, करुणा, अहिंसा, दया भाव यह सिखाया, वास्तविक जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए और जैसे-जैसे वो धर्म पिता की आत्मा नीचे आती हैं वो जब प्रचार- प्रसार करती हैं तो सब आत्माएं सहज स्वीकार करती चली जाती हैं (परमधाम से आने वाली आत्माये) इस तरह एक नया धर्म बन गया बौद्ध धर्म।धीरे- धीरे काफी समय इसका भी प्रचार प्रसार चला फिर धीरे- धीरे इसका भी प्रभाव कम होने लगा लेकिन आज हम देखते हैं कि बुद्ध के जाने के बाद सबसे अधिक प्रतिमा बुद्ध की बनी। हेनयान और महायान यह बौद्ध धर्म के पंथ पड़े।

◼️ आगे चलें तो आज से कुछ वर्ष 2000 वर्ष पहले क्राइस्ट आये।क्राइस्ट भी जब आये इन्होंने अपनी 30 वर्ष की आयु तक कोई प्रचार- प्रसार नहीं किया जब इनकी उम्र 30 वर्ष हुई तब दिखाते हैं कि एक बार ये नदी से जब स्नान करके बाहर निकले इन्हें लगा कि किसी लाइट ने मेरे तन में प्रवेश किया और तब से इन्होंने ज्ञान सुनाना और लोगों की बीमारी ठीक करना शुरू कर दिया तो इनके तन में एक पवित्र आत्मा परकाया प्रवेश हुई। जैसा कि आपको बताया कि धर्म की स्थापना के लिए पवित्रता का बल चाहिए और क्राइस्ट को दिखाया कि ये तो गृहस्थी थे पत्नी और एक बच्चा भी था। इसलिए पवित्र आत्मा परकाया प्रवेश करके ये कार्य करती हैं। क्राइस्ट ने मानव को प्रेम और भाईचारे की भाषा सिखाई।कौरव 100 दिखाते है तो आज भगवान से प्रीत रखने वाले कितने थोड़े ही हैं जो हुए पांडव हम आत्माएं और कौरव कौन जो परमात्मा से विपरीत बुद्धि रखती तो वो हो गयी 100 अर्थात बहुत सारी।

◼️ आज भगवान से विपरीत बुद्धि तो बहुत हैं और प्रीत बुद्धि की ही विजय होती हैं। उन्ही विजयी आत्माओं की यादगार हैं वैजयंती माला जिसको हिन्दू, मुस्लिम सब सिमरते हैं ये माला क्यों बनाई। राम-राम जपते तो बुद्धि गिनती में जाएंगी या राम में जायेगी। लेकिन ये माला भगवान कहते सिमरने की जरूरत नहीं।लेकिन ये माला किसकी यादगार हैं।आज अष्ट रत्नों का गायन है, 16108 जो हैं ये विजयी आत्माएं हैं जो अपने विकारों पर पूर्णतः विजय प्राप्त करके जैसे घर से आये थे, सतोप्रधान, ऐसे ही भगवान की याद में प्योर होकर जायेंगे। जो भगवान के समान हैं। भगवान तो कोई नहीं बन सकता। तो भगवान के साथ साथ इनकी भी अष्ट रत्नों के रूप में पूजा होती है।परमात्मा कहते-माला सिमरने की जरूरत नहीं लेकिन माला में आने का पुरुषार्थ करो।

◼️ तो अब इस पुरानी सृष्टि का विनाश होना है और जो कलम लगती है वो पुराने पेड़ से लगती हैं।ये नहीं भगवान इस सारी सृष्टि को खत्म कर देता। लेकिन 9 लाख या 33 करोड़ आत्माएं अब जब परमात्मा का ज्ञान योग सुनेगें तो उनके दिल में वो बात जायेगी और वही फिर निकलके फिर से ऐसा बनने का पुरुषार्थ करेगें। सन्देश तो सबको जाता लेकिन निकलेगी देवी- देवता धर्म की आत्माएं और जब पुराना पेड़ जो न फल देता न छाया देता तो क्या करते उसे काट देते। इसी तरह इस पुरानी दुनिया में न सुख हैं न चैन। विनाश इसलिए होना हैं। धर्म पिताओं की आत्माएं जब आती हैं ये अपने पिछाड़ी आत्माओं को तो लेकर आती हैं लेकिन वापिस कोई भी नहीं ले जा सकता।वापिस सबको ले जाने का काम परमात्मा का ही है इसलिए परमात्मा को सदगति दाता या लिबरेटर कहा जाता है। इसी के यादगार में शिव की बारात दिखायी है जिसमें अंत में सभी देवी-देवता, राक्षस, अंधे, बहरे, लूले-लंगड़े आदि हर प्रकार की आत्माएं इस पृथ्वी से परमधाम जाती है। शिव साजन लेकर जाते हैं। तो इस समय परमात्मा उसी स्थापना व दिव्य कार्य के लिये सृष्टि पर आ चुके हैं!

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🙎🏻‍♂ मनुष्य आत्मा 84 लाख योनियाँ धारण नहीं करती

🟣 परमप्रिय परमपिता परमात्मा शिव ने वर्तमान समय जैसे हमें ईश्वरीय ज्ञान के अन्य अनेक मधुर रहस्य समझाये है, वैसे ही यह भी एक नई बात समझाई है की वास्तव में मनुष्यात्माएं पाशविक योनियों में जन्म नहीं लेती यह हमारे लिए बहुत ही खुशी की बात है परन्तु फिर भी कई लोग ऐसे लोग है जो यह कहते की मनुष्य आत्माएं पशु-पक्षी इत्यादि 84 लाख योनियों में जन्म-पुनर्जन्म लेती है

🟣 वे कहते है की – “जैसे किसी देश की सरकार अपराधी को दण्ड देने के लिए उसकी स्वतंत्रता को छीन लेती है और उसे एक कोठरी में बन्द कर देती है और उसे सुख-सुविधा से कुछ काल के लिए वंचित कर देती है, वैसे ही यदि मनुष्य कोई बुरे कर्म करता है तो उसे उसके दण्ड के रूप में पशु-पक्षी इत्यादि भोग-योनियों में दुःख तथा परतंत्रता भोगनी पड़ती है”

🟣 परन्तु अब परमप्रिय परमपिता परमात्मा शिव ने समझया है की मनुष्यात्माये अपने बुरे कर्मो का दण्ड मनुष्य-योनि में ही भोगती है। परमात्मा कहते है की मनुष्य बुरे गुण-कर्म-स्वभाव के कारण पशु से भी अधिक बुरा तो बन ही जाता है और पशु-पक्षी से अधिक दुःखी भी होता है, परन्तु वह पशु-पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म नहीं लेता यह तो हम देखते या सुनते भी है की मनुष्य गूंगे, अंधे, बहरे, लंगड़े, कोढ़ी चिर-रोगी तथा कंगाल होते है, यह भी हम देखते है की कई पशु भी मनुष्यों से अधिक स्वतंत्र तथा सुखी होते है, उन्हें डबलरोटी और मक्खन खिलाया जाता है, सोफे (Sofa) पर सुलाया जाता है, मोटर-कार में यात्रा कराई जाती है और बहुत ही प्यार तथा प्रेम से पाला जाता है, परन्तु ऐसे कितने ही मनुष्य संसार में है जो भूखे और अद्-र्धनग्न जीवन व्यतीत करते है और जब वे पैसा या दो पैसे मांगने के लिए मनुष्यों के आगे हाथ फैलाते है तो अन्य मनुष्य उन्हें अपमानित करते है कितने ही मनुष्य है जो सर्दी में ठिठुर कर, अथवा रोगियों की हालत में सड़क की पटरियों पर कुते से भी बुरी मौत मर जाते है और कितने ही मनुष्य तो अत्यंत वेदना और दुःख के वश अपने ही हाथो अपने आपको मार डालते है! अत: जब हम स्पष्ट देखते है की मनुष्य-योनि भी भोगी-योनि है और की मनुष्य-योनि में मनुष्य पशुओं से अधिक दुःखी हो सकता है तो यह क्यों माना जाए की मनुष्यात्मा को पशु-पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म लेना पड़ता है❓

🌳 🥭 जैसा बीज वैसा वृक्ष 🥭 🌳

🟣 इसके अतिरिक्त, यह एक मनुष्यात्मा में अपने जन्म-जन्मान्तर का पार्ट अनादि काल से अव्यक्त रूप में भरा हुआ है और, इसलिए मनुष्यात्माएं अनादि काल से परस्पर भिन्न-भिन्न गुण-कर्म-स्वभाव प्रभाव और प्रारब्ध वाली है! मनुष्यात्माओं के गुण, कर्म, स्वभाव तथा पार्ट (Part) अन्य योनियों की आत्माओं के गुण, कर्म, स्वभाव से अनादिकाल से भिन्न है! अत: जैसे आम की गुठली से मिर्च पैदा नहीं हो सकती बल्कि “जैसा बीज वैसा ही वृक्ष होता है”, ठीक वैसे ही मनुष्यात्माओं की तो श्रेणी ही अलग है मनुष्यात्माएं पशु-पक्षी आदि 84 लाख योनियों में जन्म नहीं लेती बल्कि, मनुष्यात्माएं सारे कल्प में मनुष्य-योनि में ही अधिक-से अधिक 84 जन्म, पुनर्जन्म लेकर अपने-अपने कर्मो के अनुरूप सुख-दुःख भोगती है!

🟢 यदि मनुष्यात्मा पशु योनि में पुनर्जन्म लेती तो मनुष्य गणना बढ़ती ना जाती

🟣 आप स्वयं ही सोचिये कि यदि बुरी कर्मो के कारण मनुष्यात्मा का पुनर्जन्म पशु-योनि में होता, तब तो हर वर्ष मनुष्य-गणना बढ़ती ना जाती, बल्कि घटती जाती क्योंकि आज सभी के कर्म, विकारों के कारण विकर्म बन रहे है परन्तु आप देखते है कि फिर भी मनुष्य-गणना बढ़ती ही जाती है, क्योंकि मनुष्य पशु-पक्षी या कीट-पतंग आदि योनियों में पुनर्जन्म नहीं ले रहे है

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